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ऋषि को हीरो नहीं बनाना चाहते थे राज कपूर, मगर किस्मत ने खेला खेल

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Film प्रचार

फिल्म प्रचार डेस्क

शो मैन राज कपूर अपने बेटे ऋषि कपूर को ऐक्टर नहीं, डायेक्टर बनाना चाहते थे। उन्हें फिल्मों के प्रति ऋषि की समझ देख कर लगता था कि वह एक अच्छे निर्देशक साबित हो सकते हैं। राज कपूर अपने आरके बैनर तले ही ऋषि को फिल्म निर्देशन का मौका देने का इरादा बना रहे थे परंतु किस्मत को कुछ और मंजूर था। एक के बाद एक राज कपूर की दो महत्वाकांक्षी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह लुढ़क गई थीं। उन्हें जबर्दस्त घाटा हुआ था और वह भारी कर्ज में डूब गए थे। 1970 मे आई मेरा नाम जोकर और 1971 में कपूर सितारों से सजी तीन पीढ़ियों की कहानी कल आज और कल को दर्शकों ने ठुकरा दिया था। नतीजा यह कि राज कपूर ने तय कर लिया कि वह अब किसी तरह का प्रयोग करने का जोखिम नहीं लेंगे और कोई रोमांटिक कहानी पर्दे पर उतारेंगे। वह किसी युवा रोमांटिक सितारे के साथ फिल्म बनना चाहते थे। 1969 में आई आराधना के साथ राजेश खन्ना सुपर स्टार बन चुके थे और उनका जबर्दस्त क्रेज था। मगर राज कपूर को इतना आर्थिक नुकसान हो चुका था कि वह राजेश खन्ना की फीस चुकाने में समर्थ नहीं थे और साथ ही वह फिल्म बनाने के लिए सितारे की डेट्स का इंतजार भी करना नहीं चाहते थे। इन हालात में राज कपूर ने तय किया कि अपने 20 साल के बेटे ऋषि कपूर को फिल्म का हीरो बनाएंगे। फिल्म थी बॉबी। ऋषि कपूर की हीरोइन के लिए ऑडिशन लिए गए और उनमें दो चेहरे चुने गए। एक डिंपल कपाड़िया और दूसरी नीतू सिंह। आखिरी दौर में 16 साल की डिंपल को ऋषि की हीरोइन बनने का मौका मिला।  मगर नियति का खेल देखिए कि बॉबी में नहीं चुनी गई नीतू सात साल बाद ऋषि कपूर की पत्नी बनीं। जबकि जो राजेश खन्ना बॉबी के हीरो नहीं बन सके, उस फिल्म की हीरोइन डिंपल के पति बने।

जब ऋषि बने डायरेक्टर

-ऋषि कपूर ने ऐक्टिंग की रोमांटिक पारी खेलने के बाद निर्देशन में भी हाथ आजमाया। फिल्म बनाई, आ अब लौट चलें (1999)। लेकिन फिल्म नहीं चली। बतौर निर्देशक यह ऋषि कपूर की पहली और एकमात्र फिल्म है। यह प्रतिष्ठित आरके बैनर्स की भी अंतिम फिल्म साबित हुई। फिल्म में अक्षय खन्ना, ऐश्वर्या राय बच्चन, राजेश खन्ना और सुमन रंगनाथन थे। फिल्म की नाकामी से ऋषि निराश थे मगर उन्होंने निर्देशन में आगे बढ़ने का इरादा नहीं छोड़ा था। समस्या सिर्फ एक थी कि अच्छी स्क्रिप्ट आए। वह अच्छी स्क्रिप्ट उन तक कभी नहीं पहुंची।


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