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Gunjan Saxena-The Kargil Girl*** Review: एक आम लड़की के सपनों की ऊंची उड़ान

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Film प्रचार

फिल्म प्रचार डेस्क

गुंजन सक्सेनाः द कारगिल गर्ल 12 अगस्त (बुधवार) को ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो रही है। स्वतंत्रता दिवस से पूर्व आ रही इस फिल्म में देशभक्ति और समाज में महिलाओं की उन्नति की तस्वीर देखी जा सकती है। यह उस दौर को दिखाती है जब युद्ध में किसी महिला के उतरने की बात एक राष्ट्रीय मुद्दा थी। मगर इसी दौर में सामने आईं गुंजन सक्सेना। कहानी लखनऊ में शुरू होती है एक लड़की गुंजू (जाह्नवी कपूर) के सपने के साथ। हवाईजहाज उड़ाना उसका ख्वाब है। वह दसवीं करने के बाद पायलट बनना चाहती है मगर क्या घर से इजाजत मिलेगी। क्या उसे घर में अपने इस सपने के बारे में बताना चाहिए। तब उसकी सहेली समझाती है कि बताना चाहिए। घर में कहना चाहिए, ‘मेरी उम्र की लड़कियां लड़कों के साथ भाग जाती हैं, पर मुझे देखो… अपने ख्वाब के साथ उड़ना चाहती हूं।’ गुंजन तीन बार पायलट बनने के लिए दिल्ली के ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में जाती है मगर हर बार एजुकेशन क्वालिफिकेशन बढ़ जाती है। होते-होते वह दसवीं से बारहवीं और फिर ग्रेजुएट हो जाती मगर अंत में मुद्दा है, फीस। दस लाख लगेंगे और उस पर पायलट बनने में छह-सात साल अलग से।

मुश्किलें आती हैं तो रास्ते भी निकलते हैं। अचानक एक दिन पहली बार भारतीय वायुसेना में महिला ऑफिसरों की भर्ती का विज्ञापन अखबार में निकलता है और गुंजू के सपनों को पंख मिल जाते हैं। इसके आगे की कहानी में निर्देशक ने समाज की सोच को भी शामिल कर लिया है। जिसमें यही माना जाता है कि फौज महिलाओं की जगह नहीं है। दुश्मन से लड़ना उनके बस का नहीं। वह कमजोर हैं। गुंजन अपने सपनों के पंख लगाए उड़ते हुए पहले अपनों से ही लड़ती है। महिलाओं को कमजोर समझने वालों से लड़ती है। इस लड़ाई में उसे सबसे ज्यादा साथ अपने पिता (पंकज त्रिपाठी) का मिलता है। दूसरा साथ मिलता है अपनी यूनिट के सबसे प्रमुख कमांडर (मानव विज) का। फिल्म में जहां-जहां जाह्नवी और पंकज के पिता-पुत्री वाले प्रसंग आए हैं, वह दृश्य खूबसूरत बने हैं। उनमें एक अलग किस्म की संवेदना है। यह संवेदना ही आज की आम लड़कियों के सपनों को ताकत दे सकती है कि अगर उन्हें घर में किसी का साथ मिल जाए तो वह भी पिंजरे तोड़ कर उड़ सकती हैं।

निर्देशक के रूप में शरण शर्मा की यह पहली फिल्म है और उन्होंने ऐसा विषय लिया है, जिसका विस्तार बड़ा है। यहां कहानी उन गुंजन सक्सेना की है जो न केवल कारगिल युद्ध भूमि (1999) में उतरने वाली पहली भारतीय महिला पायलट बनीं, बल्कि मुद्दा स्त्री-पुरुषों की बराबरी के संघर्ष का भी है। शरण शर्मा ने महिलाओं की बराबरी के मुद्दे को खूब जोरशोर से यहां उठाया है। फिल्म का संगीत भी इस मुद्दे को ध्यान में रख कर तैयार किया गया। नई पीढ़ी की लड़कियों को गुंजन सक्सेना की कहानी आकर्षित और प्रेरित कर सकती है। साथ ही देशभक्ति का जज्बा भी युवाओं के दिल में हिलोरें पैदा कर सकता है।

फिल्म में जाह्नवी कपूर गुंजन के किरदार में ढलने के लिए कड़ी मेहनत करती हैं। वह सैनिक पोशाक में भी खुद को उसके अनुकूल ढालने के प्रयास में रहती हैं। जाह्नवी का करिअर अभी शुरुआती दौर में है और उन्हें खुद को जमाने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ेगा। पंकज त्रिपाठी के साथ उनके दृश्य अच्छे बने हैं। पंकज फिल्म की जान हैं और उनका अभिनय सधा हुआ है। इसी तरह अंगद बेदी, विनीत कुमार, मानव विज, आयशा रजा मिर्जा भी अपनी भूमिकाओं में फिट हैं।

-ओटीटीः नेटफ्लिक्स

-निर्माताः धर्मा प्रोडक्शंस

-निर्देशकः शरण शर्मा

कलाकारः जाह्नवी कपूर, पंकज त्रिपाठी, अंगद बेदी, विनीत कुमार, मानव विज, आयशा रजा मिर्जा

रेटिंग***


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